28 मार्च 2020 - 13:37
आयत क्या कहती हैं? हां अगर वे सच्चे दिल से तौबा करें तो ईश्वर उन्हें अपनी दया व कृपा का पात्र बना कर उनके पापों को क्षमा कर सकता

जिन सच्चे ईमान वालों ने शत्रु से मुक़ाबले के लिए सैन्य वस्त्र धारण किया, अपने आपको इस्लाम के मार्ग में न्योछावर करने के लिए तैयार हुए।

सूरए अहज़ाब की आयत क्रमांक 24 और 25 का अनुवादः

(यह सब इस लिए हुआ) ताकि ईश्वर सच्चों को उनकी सच्चाई का प्रतिफल दे और मिथ्याचारियों को चाहे तो दंड दे या चाहे तो उनकी तौबा स्वीकार कर ले। निश्चय ही ईश्वर अत्यंत क्षमाशील (व) दयावान है। और ईश्वर ने काफ़िरों को कोई लाभ हासिल किए बिना उनके क्रोध के साथ यूंही लौटा दिया। और ईश्वर (अहज़ाब के) युद्ध में ईमान वालों के लिए काफ़ी हो गया (और उसने उन्हें लड़ाई से आवश्यकतामुक्त करके विजयी बना दिया)। और ईश्वर अत्यंत शक्तिवान व अजेय है।

 

संक्षिप्त टिप्पणी:

इस घटना से ईश्वर ने मुसलमानों को सिखाया कि कभी भी दुश्मन से न डरें और शत्रुओं को भी जान लेना चाहिए कि ईश्वर की युक्तियों के मुक़ाबले में उनकी चालें प्रभावहीन हैं और वे ईश्वरीय शक्ति पर विजय हासिल नहीं कर सकते।

 

इन आयतों से मिलने वाले पाठ:

  1. केवल बात में सच्चाई पर्याप्त नहीं है, कर्म में भी ईश्वर से की गई प्रतिज्ञा को सच करके दिखाना चाहिए और ईश्वर के धर्म की मदद में ढिलाई नहीं करनी चाहिए।

  2. ईश्वर की दया व कृपा किसी से दूर नहीं है, यहां तक कि प्रतिज्ञा तोड़ने वाले मिथ्याचारियों के बारे में भी आशा है कि वे तौबा करके ईश्वरीय क्षमा का पात्र बन सकते हैं।

  3. जीवन के विभिन्न मामलों में केवल भौतिक समीकरणों पर ही भरोसा नहीं करना चाहिए और ईश्वरीय सहायताओं की ओर से निश्चेत नहीं होना चाहिए।